The Bride Review: झबरीले बाल और काली जुबान वाली ‘दुल्हन’ की कहानी… ‘फीमेल जोकर’ की ये फिल्म सबके लिए नहीं है!
साल 2019 में आई फिल्म 'जोकर' एक क्लासिक फिल्म थी, क्लासिक कहानी 1818 की फ्रैंक स्टीन भी थी. अब सोचिए कि जोकर का फीमेल वर्जन और फ्रैंक स्टीन एक साथ आ जाएं तो क्या आग लगेगी स्क्रीन पर. 'द ब्राइड!' एक ऐसी ही कहानी है, लेकिन इस 'डेडली कॉम्बिनेशन' को अपनाने के चक्कर में कहीं न कहीं ये फिल्म अपना मायना खो देती है. जानिए कैसी है डायरेक्टर मैगी गायलेनहॉल के डायरेक्शन में बनी फिल्म 'द ब्राइड!'.
साल 1818 की एक कहानी ने हाल ही में लोगों का ध्यान तब खींचा जब नेटफ्लिक्स पर एक फिल्म आई. फिल्म का नाम- ‘फ्रैंक स्टीन’. ऐसा कुछ नहीं था, जो पहले देखा या सुना नहीं गया, फिर भी इस मॉन्स्टर की कहानी में कुछ तो ऐसा था, जिसने इस फिल्म को ऑस्कर की दहलीज तक पहुंचा दिया. ये फिल्म ऑस्कर के लिए नॉमिनेट की गई है. फिल्म को काफी पसंद किया गया.
एक पागल साइनटिस्ट अपनी सनक के कारण अलग-अलग अंगों को जोड़कर एक ऐसे शख्स को बनाता है, जो एक मॉन्स्टर जैसा दिखता है. अपनी कल्पना से डरकर वो साइनटिस्ट उसको अकेला छोड़ देता है और अकेलेपन के कारण वो मॉन्सटर इनसानियत को भूल जाता है. ये कहानी है फ्रैंक स्टीन की. फ्रैंक स्टीन की कहानी में जो अकेलापन दिखाया गया है उसे पर्दे पर उसी तरह से दिखाना किसी चुनौती से कम नहीं है. लेकिन यहां बात फ्रैंक स्टीन की नहीं होगी. यहां बात होगी उसकी ब्राइड या फिर सिर्फ ‘द ब्राइड’ की.
तो 7 मार्च को मेरा जन्मदिन था और मेरी एक ख्वाहिश थी कि मुझे ये फिल्म दिखा दी जाए. मेरे पतिदेव ने इस बात को समझा और मुझे ले गए एक ऐसे थिएटर में जहां ये शो तो लगा था, लेकिन देखने के लिए केवल हम ही पहुंचे थे. शो के लिए पर्याप्त ऑडियंस नहीं थी इसलिए शो कैंसिल होने जा रहा था, लेकिन फिर हम आ गए तो आखिरकार हमें एक खाली थिएटर में ये फिल्म देखने को मिली. फिल्म का नाम ‘द ब्राइड!’.
इडा की तलाश और मौत!
द ब्राइड! की कहानी है इडा की. इडा जो बेहिसाब शोर में बैठी खुद के अंदर की खोई हुई शांती को ढूंढ रही है. अचानक इडा को लगता है कि उसके साथ कुछ अजीब हो रहा है. उसके अंदर से कोई और बोल रहा है, ये आवाज है मैरी शैली की. मैरी जो फ्रैंक स्टीन की कहानी की असली राइटर है. लेकिन इडा से उसका क्या लेना-देना है? मैरी क्यों इडा पर काबू पा रही है? वो इडा को इतना परेशान करती है कि इडा के साथ एक हादसा होता है और वो मर जाती है. इडा से ध्यान हटता है और हमें फ्रैंक स्टीन (क्रिश्चियन बेल) का किरदार दिखाया जाता है जो एक डॉक्टर के पास अपने खालीपन का इलाज करवाने आया है. वो चाहता है कि उसी की तरह किसी मरी हुई लड़की को जिंदा किया जाए और वो बने फ्रैंक स्टीन की ब्राइड. फिर क्या, एक कब्र खोदी जाती है और फ्रैंक स्टीन पहली बार इडा को देखता है. उसे जिंदा किया जाता है, लेकिन असली इडा अबतक सो रही है.
एक्टिंग में कमाल का काम
इडा की जिंदगी का संघर्ष, उसका गुस्सा, समाज के प्रति उसकी नफरत को जिस खूबसूरती के साथ जैसी बक्ली ने निभाया है, ये कहना गलत नहीं होगा कि स्क्रीन पर जैसी को देखते वक्त आप पलक तक झपकाने की गलती नहीं करेंगे. क्रिश्चियन बेल ने फ्रैंक स्टीन के किरदार को जीया है. उन्होंने इस ‘मरे’ हुए किरदार को इस तरह से बड़े पर्दे पर जिंदा किया है कि जब कभी भी इस किरदार का जिक्र होगा तो क्रिश्चियन का निभाया ये फ्रैंक स्टीन का रोल याद किया जाएगा. अगर आपको द ब्राइड! को किसी जॉनर में रखना हो तो ये एक गॉथिक क्राइम-थ्रिलर है, लेकिन इस कहानी की कोर में लव स्टोरी है, यही इस कहानी की खासियत और यही इस कहानी की सबसे बड़ी खामी है.
फीमेल जोकर बनते-बनते रह गई द ब्राइड!
जब साल 2019 में ‘जोकर’ आई थी, तो जोकर के अंतरद्वंद को बड़े पर्दे पर उतारने के लिए वॉकिन फीनिक्स को ऑस्कर मिला था. मिलता भी क्यों नहीं, उस फिल्म में वॉकिन फीनिक्स ने कुछ ऐसा कर दिखाया जो बड़े-बड़े एक्टर्स के लिए भी करना मुश्किल हो जाता है. द ब्राइड! में भी जैसी और क्रिश्चियन ने कुछ वैसा ही जादू किया है. ये दोनों लोगों को मार रहे हैं, उनके सिर को कुचल रहे हैं, अपने होठों से दूसरों की जीभ को फाड़ रहे हैं, लेकिन फिर भी इनकी आजादी आपको चुभ नहीं रही, क्योंकि आपको ये किरदार बेहद अपने लगते हैं. लेकिन जोकर में एक खासियत थी कि उसकी कहानी की दिशा बदलती नहीं. वो स्थिर रहती है. द ब्राइड यहीं मात खा जाती है.
कहानी जो फेमिनिज्म को नया एंगल देने की बात करती है वो लव स्टोरी के एंगल में भटक जाती है. इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म का हर एक फ्रेम आपको इसे देखने के लिए मजबूर कर देगा. एक्टिंग, स्टोरीटेलिंग, बैकग्राउंग स्कोर, म्यूजिक और कॉस्ट्यूम के मामले में ये फिल्म झंडे गाड़ती है, लेकिन फिल्म देखते हुए आपको एक पल ऐसा लगेगा कि फ्रैंक स्टीन और इडा के बीच का अजीबोगरीब प्यार और कमाल की केमेस्ट्री इस फिल्म की जान है, लेकिन वहीं दूसरी ओर कहानी फेमिनिज्म के टॉपिक के साथ जस्टिस करने के चक्कर में कुछ और ही दिशा पकड़ लेती है और खुद में ही उलझ जाती है और आखिरकार आपके पास कुछ सवाल ही रह जाते हैं. ये फिल्म सबके लिए नहीं है, ये एक ऐसा आर्ट पीस है जो आपको शुरुआत में अजीब लगेगा और फिर धीमे-धीमे इसका रंग चढ़ेगा. ये आपको ऊबाएगा भी और आपको मंत्रमुग्ध भी करेगा. फिल्म R रेटिड है, 18 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ ये फिल्म देखने कतई न जाएं, बाकी, आपकी मर्जी.



