‘मिर्जापुर’ की गलियों में जौन एलिया भी हैं… नज़्म ‘रम्ज़’ और उस कमरे की कहानी, जहां सिर्फ किताबें थीं
'मिर्जापुर: द मूवी' में जौन एलिया की नज़्म 'रम्ज़' को भी जगह मिली है. इस नज़्म के सहारे दो ऐसे किरदारों के इमोशंस को जाहिर किया गया है, जो 'मिर्जापुर' की दुनिया के होकर भी उस दुनिया के नहीं हैं.
‘मिर्जापुर: द मूवी. मारधाड़, खून-खराबा, सियासत, गद्दी, बदले की जंग और जंग में कुछ भी कर गुजरने की कहानी. 3 घंटे 15 मिनट की फिल्म. आखिर में पर्दे पर लिखा आता है- ‘The End’. उसके बाद दर्शकों के कई बंटे हुए वर्ग. कोई थिएटर से मूलचंद त्रिपाठी उर्फ मुन्ना भैया के संवादों में खोए हुए निकलता है, तो कोई कालीन भैया द्वारा बात कहते हुए शब्दों के उनके चुनाव, और जिस ठहराव से वो अपनी बात कहते हैं, उसका मुरीद हो जाता है. लेकिन इन सबके बीच पीछे छूट जाती है, उस शायर के कमरे की कहानी, जिसके कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं. नाम- जौन एलिया.
जी हां, वही जौन, जिनकी पैदाइश उत्तर प्रदेश के अमरोहा की है, लेकिन जब देश ने बंटवारे की सूरत देखी तो उनके परिवार ने पाकिस्तान का रुख कर लिया. जौन कुछ सालों तक हिंदुस्तान में ही रहे. परिवार चाहता था कि जौन भी पाकिस्तान आ जाएं ताकि सब साथ रह सकें. 1957 के आसपास ना चाहते हुए परिवार की खातिर जौन को भी पाकिस्तान जाना पड़ा. वो पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनका दिल हमेशा हिंदुस्तानी रहा. जौन खुद कहा भी करते थे, मैं पाकिस्तान का नहीं हिंदुस्तान का शायर हूं. वो मिलिनेलियल्स और Genz सबके पसंदीदा हैं. गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले शायर हैं.
‘मिर्जापुर: द मूवी’ में जौन एलिया को जगह मिली
कहानीकार और लेखक पुनीत कृष्णा ने ‘मिर्जापुर: द मूवी’ में जौन को भी जगह दी है. उनकी नज़्म ‘रम्ज़’ के जरिए फिल्म के उन दो किरदारों के जज़्बातों को जाहिर किया गया है, जिनके दिल में एक दूसरे के लिए कहीं ना कहीं कोई भावना तो है, लेकिन वो भावना अनकही है. वो किरदार ‘मिर्जापुर’ की बारूदी दुनिया का हिस्सा हैं, लेकिन कट्टे और खूनी खेल से परे वो जौन को भी पढ़ते हैं. किरदार हैं बबलू और गोलू.
फिल्म के फर्स्ट हाफ में तमाम प्रेमी जोड़ों के साथ एक गाना फिल्माया गया है…’वारूं’. गाना बजता है. कोई प्रेमी जोड़ा कपड़े की दुकान पर जाता है, तो कोई बाजार में टहलता है. बबलू और गोलू किताब की दुकान पर जाते हैं. बबलू, जौन एलिया की किताब खरीदता है और कहीं कोने में 20वीं सदी के सबसे बड़े शायर को पढ़ता है.
जौन के लिखे अल्फाज़ों को बबलू कहता है-
तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं
पीछे से गोलू आती है और आगे की लाइनें कहती है-
मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं
बबलू का नज़्म की शुरुआत करना और आगे की लाइनें गोलू का पढ़ना, दोनों के जज़्बातों को जाहिर करता है. फिर गोलू भी एक दूसरी किताब लिए वहां से चली जाती है. किताबें पढ़ना, जौन के सहारे अपनी बातों को कहना, ये सीन एक दूसरे के प्रति दोनों की भावनाओं को तो दिखाता ही है, साथ ही ये भी बताता है कि ये दोनों किरदार हैं तो ‘मिर्जापुर’ के, लेकिन ‘मिर्जापुर’ की दुनिया से जुदा हैं.
बबलू ने तो खुद के लिए पढ़-लिखकर किसी अच्छी नौकरी में जाने के ख्वाब सजाए थे, लेकिन किसी तरह वो आ गया कालीन भैया की दहलीज पर. वो इस दुनिया का ना होकर भी इस दुनिया का हो गया. और अब कालीन की दुनिया से चाहकर भी बाहर का रास्ता इख़्तियार करना, उसके लिए मुश्किल है, क्योंकि कालीन भैया खुद कहते है- यहां लोग आते अपनी मर्जी से हैं, लेकिन जाते हमारी मर्जी से हैं.
जिस नज़्म के सहारे बबलू और गोलू की कहानी फिल्म में दर्शाई गई है, उस नज़्म की भी अपनी कहानी है, अपना दर्द है. जौन ने अपनी नज़्म रम्ज़ क्यों लिखी थी? किसके लिए लिखी थी? उनकी नज़्म में तुम कौन है? जिसे वो कहते हैं कि जब तुम आओगी…
नज़्म ‘रम्ज़’ की कहानी
‘रम्ज़’ जौन की जिंदगी के सबसे गहरे, उदास और कड़वे एहसासात हैं. और जौन जिसे ‘तुम’ से मुखातिब करते हैं, वो कोई और नहीं बल्कि जाहिदा हिना हैं. पाकिस्तान की जानी-मानी लेखिका और पत्रकार. उर्दू पत्रिका ‘इंशा’ में काम और अदबी महफिलों के दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी. दोस्ती, प्यार और फिर 1970 में शादी हुई. तीन बच्चों ने भी जौन और जाहिदा के रूप में मां-बाप की सूरत देखी.
जौन और जाहिदा में मोहब्बत तो थी, लेकिन दोनों का मिज़ाज जुदा था. आलम ये हुआ कि 1984 में मिज़ाज के साथ-साथ दोनों की राहें भी जुदा हो गईं…तलाक.
जाहिदा के जाने के बाद कराची का एक कमरा ही जौन का ठिकाना हो गया. कमरे में धूल, किताबें, बिखरी सिगरेट की राख और बेपनाह तन्हाई के सिवा वहां कुछ ना था. उसी तन्हाई को जौन अल्फाज़ों के सहारे जाहिर करते. उसी तन्हाई में ‘रम्ज़’ वजूद में आई.
जौन की पूरी नज़्म ‘रम्ज़’
तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं
मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं
इन किताबों ने बड़ा जुल्म किया है मुझ पर
इन में इक रम्ज़ है, जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन
मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता
जिंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता.




