‘तमीज-तहजीब नहीं, निर्देशकों की नहीं सुनते…’, टीवी कलाकारों को लेकर बोलीं अभिनेत्री शगुफ्ता अली
दिग्गज एक्ट्रेस शगुफ्ता अली टीवी का जाना-माना नाम हैं और बहुत लंबे समय से इंडस्ट्री में एक्टिव हैं. अब उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बात करते हुए कहा कि आज टीवी पर प्रोफेशनल रवैये की कमी है. इसी के साथ उन्होंने और भी कई बातें कही हैं.
शगुफ्ता अली कई सीरियल में काम कर चुकी हैं. ‘वीर की अरदास वीरा’ सीरियल से उन्हें ‘मोटी चाईजी’ के रूप में घर-घर पहचाना गया. इसी के साथ वो फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं. एक इंटरव्यू में उन्होंने टीवी पर मिले अवसरों के लिए खुद को आभारी बताया. इसी के साथ उन्होंने टीवी पर शूट करने के कल्चर में आए बदलाव को लेकर भी बात की और आज टाइम में सबसे ज्यादा निराश कर देने वाले फैक्ट्स के बारे में बात करते हुए कहा कि लोगों में अनुशासम और पेशेवर रैवेये की कमी है.
अभिनेत्री शगुफ्ता अली ने अपने समय के टीवी में शूट के तरीकों और पुराने लोगों के बारे में बात की साथ ही आज के कलाकारों को लेकर भी अपनी बात रखी है और बताया कि कई बार निर्देशकों की भी नहीं सुनी जाती है.
तहजीब गायब होता जा रहा
शगुफ्ता अली ने इंटरव्यू में बात करते हुए कहा, “अब जो कुछ सालों से टीवी सीरियल बंद हो रहे हैं तमीज-तहसीब नहीं है. ये बात तो आप अभी भी पुराने लोगों से पूछे तो वो लोग भी यही कहेंगे. मेरे अकेले की शिकायत नहीं है. जितने सीनियर्स हैं उनमें से, कुबूल करेंगे, वो लोग बताएंगे कि ‘हां, तमीज तहजीब ये सब कुछ नहीं है’ ‘गुड मॉर्निंग, हेलो, हाय, क्या होता है ये पता नहीं’.”
मोबाइल में लगे रहना सबसे बड़ी वजह
शगुफ्ता अली ने ये भी बताया कि मोबाइल फोन टेलीविजन पर ध्यान भटकाने का सबसे बड़ा कारण बन गए हैं. उन्होंने कहा, “एक्टर्स अक्सर दृश्य के दौरान भी अपने फोन में ही मग्न रहते हैं. ‘उनके अनुसार, यदि कोई अभिनेता शॉट के बैकग्राउंड में खड़ा है, तो उसकी निगाहें सामने वाले कलाकार पर टिकी होनी चाहिए ताकि वह स्वाभाविक प्रतिक्रिया दे सके’, लेकिन कई अभिनेता अपने फोन में ही देखते रहते हैं और निर्देशक द्वारा बार-बार माइक्रोफोन पर निर्देश दिए जाने के बावजूद दृश्य पर ध्यान नहीं देते. उन्होंने एक युवा अभिनेत्री को अपने फोन में इतना मग्न देखा कि उसने निर्देशक की आवाज भी नहीं सुनी.”
निर्देशकों के प्रति नहीं सम्मान
शगुफ्ता अली ने अपने टाइम के काम करने के लोगों के तरीकों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने हर तरह की निर्देशकों के साथ काम किया, अच्छे, बुरे और बहुत बुरे, लेकिन उन्हें कभी गलत जवाब देने की हिम्मत नहीं की. उन्होंने ये भी कहा कि वो कई बार ये जानती थीं कि किसी निर्देशक को बुनियादी चीज नहीं पता है फिर भी हमेशा सम्मान किया.
डिस्प्लिन न होने पर बोलीं शगुफ्ता
शगुफ्ता अली ये भी कहती हैं कि आज के टाइम में सेट्स पर ये देखकर निराशा होती है, लोग प्रैक्टिस को दरकिनार कर देते हैं, जबकि मॉनिटर की मौजूदगी और सेल्फी कलाकारों के लिए ज्यादा जरूरी हो जाती है. उन्होंने ये भई माना की मौजूदा वर्क कल्चर को स्वीकार करना उनके लिए मुश्किल है, क्योंकि निर्देशकों की पूरी तरह से अवहेलना की जाती है. कालाकारों में फोकस की कमी है और प्री-प्रैक्टिस बिल्कुल नहीं करते. उन्होंने ये भी बताया कि क्रू के बार-बार चुप रहने के बावजूद भी लोग शूटिंग पर बात करते रहते हैं.
लंबा रहा है करियर
शगुफ्ता अली ने फिल्म 1989 में आई फिल्म ‘कानून अपना अपना’ से डेब्यू किया था और इसी साल उन्होंने ‘दर्द’ सीरियल से टीवी डेब्यू किया. शगुफ्ता अली ‘वो रहने वाली महलों की’, ‘बेपनाह’, ‘सांस’, ‘दिशायें’, ‘कानून’, ‘वीर की अरदास वीरा’, ‘साथ निभाना साथिया’, ‘कहता है दिल’, ‘कुमकुम’, ‘मिली’, ‘जुगनी चली जालंधर’, ‘मुझे मेरी फैमिली से बचाए’, जैसे सीरियल में काम कर चुकी हैं.
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