The Vvaan Review: आस्था, डर और कॉमेडी की अतरंगी खिचड़ी, क्या उम्मीदों पर खरी उतरती है सिद्धार्थ-तमन्ना की ‘द वन’?

The Vvaan Review:  आस्था, डर और कॉमेडी की अतरंगी खिचड़ी, क्या उम्मीदों पर खरी उतरती है सिद्धार्थ-तमन्ना की ‘द वन’?

The Vvaan Review: छठ पूजा के लोक-विश्वास और डरावने जंगल के तिलिस्म को भुनाने निकली 'द वन' क्या दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती है? पढ़िए इस फिल्म का रिव्यू.

The Vvaan Review: बॉलीवुड में जब कोई नया ट्रेंड जोर पकड़ता है, तो हर मेकर अपनी हांडी उसी चूल्हे पर चढ़ाने की फिराक में लग जाता है. आजकल के ट्रेंड के मुताबिक यहां का फंडा भी बड़ा सीधा है एक लोक कथा, एक रहस्यमयी देवी का डर, छठ पूजा का पावन माहौल और उसमें हल्का-फुल्का हॉरर-कॉमेडी का तड़का. साथ ही गजब की टीम. मानिए जैसे किसी बोर्डरूम में दो अलग-अलग छोर के लोग बैठे हों. एक तरफ एकता कपूर, जिनकी ‘नागिन’ का खौफ सात सीजन से टीवी पर अमर है, और दूसरी तरफ ‘पंचायत’ और ‘गुल्लक’ जैसी मिट्टी से जुड़ी कहानियां गढ़ने वाली TVF की जमात. दोनों ने हाथ मिलाया और मिक्सी में शहरी महत्वाकांक्षा, गांव की आस्था और सुपरनैचुरल शक्तियों को डालकर एक नया शरबत तैयार किया, जिसका नाम रखा गया ‘द वन’.

अब सवाल ये उठता है कि क्या यह अलग-अलग स्वादों वाली खिचड़ी दर्शकों के हलक से आसानी से उतरती है या फिर बीच में ही बेस्वाद महसूस होने लगती है? सवाल का जवाब जानने के लिए इस पर विस्तार से बात करनी होगी.

कहानी

कहानी का केंद्र है ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा), जो मायानगरी मुंबई की चकाचौंध में अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ आशियाना बसाए हुए है. दोनों की जिंदगी में सुख-सुविधाएं तो हैं, लेकिन एक सूनापन भी है. वो लंबे समय से औलाद की आस में हैं, मगर डॉक्टर और दवाइयां कोई रास्ता नहीं दिखा पा रही हैं. इधर गांव में ऋषि के बड़े भाई (अनूप सोनी) और भाभी (श्वेता तिवारी) उसे बार-बार पुकार रहे हैं कि छठ पूजा के पावन मौके पर वो घर लौट आए, ताकि कुलदेवी का आशीर्वाद मिल सके. ऋषि बरसों से गांव की दहलीज लांघने से बचता रहा है.

लेकिन मजबूरी इंसान से क्या-कुछ नहीं कराती. पैसों की तंगी और कर्ज का फंदा जब गले तक आता है, तब ऋषि को अपनी पैतृक जमीन बेचने का ख्याल आता है. वो अपनी पत्नी और अपने दोस्त वेद (मनीष पॉल) को साथ लेकर गांव की ओर कूच करता है. इरादा साफ है, एक ऐसी पवित्र जमीन का सौदा करना, जहां से होकर नई सड़क गुजरनी है. पेंच ये है कि यह जमीन एक ऐसे पावन और वर्जित जंगल से सटी है, जहां रात के वक्त परिंदा भी पर नहीं मार सकता. गांववाले इसे कुलदेवी का स्थान मानकर पूजते हैं और जंगल को छेड़ने के सख्त खिलाफ हैं. मगर लालच में अंधा ऋषि किसी की नहीं सुनता और ज़मीन का सौदा पक्का करने की जिद ठान लेता है. बस यहीं से शुरू होता है प्रकृति, आस्था और अनदेखी ताकतों का वो चक्रव्यूह, जो ऋषि के पूरे परिवार को अपनी चपेट में ले लेता है और आगे क्या होता है ये जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर वन देखनी होगी.

कैसी है फिल्म?

सिक्के के पहले पहलू की बात करें, तो निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा ने इंटरवल से पहले की बिसात काफी सलीके से बिछाई है. मुंबई के कंक्रीट के जंगलों से निकलकर जब कैमरा बिहार के देहाती इलाकों, मिट्टी की सौंधी खुशबू और छठ घाट की रस्मों के बीच पहुंचता है, तो एक अपनापन सा महसूस होता है. पहला हाफ सस्पेंस का एक ऐसा धुआं खड़ा करता है जो दर्शक को सीट से बांधे रखता है. जंगल का वो सन्नाटा, बूढ़े-बुजुर्गों की आंखों में छुपा अनजाना खौफ और ऋषि के बचपन से जुड़े दबे हुए राज़ देखने वाले के मन में जिज्ञासा पैदा करते हैं कि आगे क्या होगा.

Tamannah And Sidharth

तमन्ना और सिद्धार्थ

मगर दिक्कत तब शुरू होती है जब इंटरवल की घंटी बजती है और फिल्म अपने दूसरे पड़ाव पर कदम रखती है. यहां आकर कहानी की रफ्तार बिल्कुल औंधे मुंह गिरती है. ऐसा लगता है कि राइटर को समझ ही नहीं आया कि जिस भूतिया जंगल और देवी के प्रकोप का इतना हौव्वा खड़ा किया गया था, उसका अंत कैसे किया जाए. फिल्म कई जगहों पर ‘पंचायत’ की तरह बनने की कोशिश करती है और अगले ही पल एकता कपूर के किसी सीरियल की तरह लाउड मेलोड्रामा में तब्दील हो जाती है. कहानी जब अपने चरम पर पहुंचनी चाहिए थी, तब बेवजह के गानों और बेतुके सीन पूरे थ्रिल का कचूमर निकाल देते हैं.

निर्देशन और राइटिंग

दीपक कुमार मिश्रा ने इससे पहले जमीन से जुड़ी कई कहानियां कही हैं, लेकिन यहां उनका विजन दो नावों की सवारी करता नजर आया. राइटिंग टेबल पर आनंदेश्वर द्विवेदी के वन-लाइनर्स कुछ जगहों पर गुदगुदाते जरूर हैं, लेकिन पूरी पटकथा में कसावट की भारी कमी खलती है. नितिन बैद की कैंची भी इस बार थोड़ी जंग खाई हुई नजर आई. एडिटिंग इतनी झटकेदार है कि एक गंभीर, डरावने सीन के तुरंत बाद अचानक कोई बेतुका कॉमिक सीक्वेंस आ धमकता है, जिससे दर्शक का मिजाज पूरी तरह उखड़ जाता है. फिल्म में सुपरनैचुरल तत्वों को समझाने के लिए जो बैकस्टोरी गढ़ी गई, उसने मामले को सुलझाने के बजाय और उलझा दिया.

अंत में इतने सारे सवाल अधूरे छोड़ दिए गए, जैसे मेकर्स ने सोच रखा हो कि बाकी सब कुछ दर्शक खुद ही अपने घर से सोचकर आए. इसके अलावा, संगीत के मोर्चे पर अमित त्रिवेदी, विशाल मिश्रा और तनिष्क बागची जैसे धुरंधरों की फौज मिलकर भी कोई ऐसा तराना नहीं दे पाई जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद जुबान पर रह जाए. गाने कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय केवल पॉपकॉर्न लाने का बहाना बनकर रह जाते हैं.

Sidharth And Manish Paul

मनीष और सिद्धार्थ

एक्टिंग

एक्टिंग की दुनिया में तमन्ना भाटिया इस पूरी भीड़ में सबसे ज्यादा चमकती हैं. एक ऐसी बेबस औरत, जिसकी गोद खाली है और जो मातृत्व के सुख के लिए आस्था और डर के बीच झूल रही है. इस किरदार के दर्द को तमन्ना ने अपनी आंखों से बयां किया है. वो फिल्म की रीढ़ बनकर खड़ी रहती हैं. दूसरी तरफ सिद्धार्थ मल्होत्रा अपने जाने-पहचाने कंफर्ट जोन में ही नजर आए उन्होंने वही काम किया जो वे ‘थैंक गॉड’ या स्टूडेंट ऑफ द ईयर या अपनी पिछली फिल्मों में करते दिखे हैं. शहरी बाबू, जो परेशानी में है और भ्रमित घूम रहा है. उनके काम में कोई खोट नहीं है, लेकिन कुछ नयापन भी महसूस नहीं होता. सपोर्टिंग कास्ट में अनूप सोनी और श्वेता तिवारी ने अपनी मंझी हुई एक्टिंग से कहानी में जान फूंक दी है. दोनों जब भी स्क्रीन पर आते हैं, ऐसा लगता है कि वो वाकई उसी मिट्टी और परिवार का हिस्सा हैं.

सुनील ग्रोवर को एक ग्रे और रहस्यमयी शेड में देखना दिलचस्प है, उन्होंने अपनी कॉमिक इमेज से हटकर फिर एक बार खुद को साबित किया. वहीं मनीष पॉल के कंधे पर हंसाने की जिम्मेदारी डाली गई है. लेकिन एक बूढ़ी औरत को डायन समझने वाला उनका मजाक इतनी बार दोहराया गया कि तीसरे सीन के बाद वह हंसाने के बजाय सिरदर्द देने लगता है.

क्यों देखें और क्यों न देखें?

अगर आपको भारतीय लोक-विश्वास, छठ पूजा की सांस्कृतिक भव्यता और रहस्यमयी जंगलों से जुड़े किस्से पसंद हैं, तो ये फिल्म एक अलग माहौल जरूर देती है. तमन्ना भाटिया की एक्टिंग और पहले हाफ की सधी हुई रफ्तार देखने लायक है. गांव के रीति-रिवाजों और लोक-परंपरा को जिस सम्मान के साथ पर्दे पर उतारा गया है, वह इसकी सबसे बड़ी खूबी है.

Sunil Grover

सुनील ग्रोवर

अगर आप किसी ऐसे हॉरर की उम्मीद में जा रहे हैं जो रोंगटे खड़े कर दे, तो यह फिल्म आपको निराश करेगी. कमजोर वीएफएक्स (VFX) और दूसरे हाफ की लड़खड़ाहट इस फिल्म की सबसे बड़ी दुश्मन है. जब कहानी में डर और रोमांच गहराना चाहिए था, तब मेकर्स ने जबरदस्ती का हास्य और लंबे गाने ठूंसकर पूरे सस्पेंस की हवा निकाल दी. क्लाइमैक्स का शोरगुल भी किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंचा पाता.

कुल मिलाकर ‘द वन’ उस स्वादिष्ट थाली की तरह थी जिसमें पकवान तो सारे बढ़िया चुने गए थे, लेकिन रसोइए ने नमक की जगह चीनी और मिर्च का ऐसा बेमेल तड़का लगा दिया कि जायका थोड़ा बिगड़ जाता है. एक पावन पर्व, लोक-संस्कृति और अलौकिक शक्तियों का संगम इस फिल्म को एक बहुत ही अनूठी पहचान दे सकता था, लेकिन ये फिल्म अपनी ही महत्वाकांक्षाओं के जाल में उलझकर रह गई. अंत तक आते-आते देवी की महिमा, जंगल का रहस्य और हॉरर-कॉमेडी का तमाशा आपस में ही जगह पाने के लिए कुश्ती लड़ते दिखाई देते हैं. एक अच्छी सोच और बेहतरीन कलाकारों के बावजूद यह फिल्म एक यादगार अनुभव बनने से एक कदम पीछे रह जाती है.

सोनाली नाईक
सोनाली नाईक

सोनाली करीब 15 सालों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रहार न्यूज पेपर से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इस न्यूज पेपर में बतौर रिपोर्टर काम करते हुए सोनाली ने एंटरटेनमेंट बीट के साथ-साथ सीसीडी (कॉलेज कैंपस और ड्रीम्स) जैसे नए पेज पर काम किया. उन्होंने वहां 'फैशनेरिया' नाम का कॉलम भी लिखा. इस दौरान एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन पत्रकारिता के जुनून की वजह से इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के इरादे से 2017 में टीवी9 से सीनियर कोरेस्पोंडेंट के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की. टीवी9 गुजराती चैनल में 3 साल तक एंटरटेनमेंट शो की जिम्मेदारी संभालने के बाद सोनाली 2020 में टीवी9 हिंदी डिजिटल की एंटरटेनमेंट टीम में शामिल हुईं. सोनाली ने टीवी9 के इस सफर में कई ब्रेकिंग, एक्सक्लूसिव न्यूज और ऑन ग्राउंड कवरेज पर काम किया है. हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, इंग्लिश भाषा की जानकारी होने के कारण डिजिटल के साथ-साथ तीनों चैनल के लिए भी उनका योगदान रहा है. रियलिटी शोज और ग्लोबल कंटेंट देखना सोनाली को पसंद है. नई भाषाएं सीखना पसंद है. संस्कृत भाषा के प्रति खास प्यार है. नुक्कड़ नाटक के लिए स्क्रिप्ट लिखना पसंद है. सोनाली के लिखे हुए स्ट्रीट प्लेज 'पानी', 'मेड इन चाइना' की रीडिंग 'आल इंडिया रेडियो' पर सोशल अवेयरनेस के तौर पर की जा चुकी है.

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